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जानिए – कहार उपजाति के विषय में….

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कहार को संस्कृत में स्कंधहार कहते हैं. जिसका तात्पर्य होता है, जो अपने कंधे पर भार ढोता है. दरअसल कहार वह जनजाति है जो कृषि का काम करती थी . खासतौर से पानी के तालाब में सिंघाड़े की पैदावार करने, मछली पकड़ने और पालकी ढोने तथा घरेलु नौकर के रूप में कार्य करना कहारों का मुख्य पेशा हुआ करता था . इस जाति के लोग उलॆखित कार्य करते हुए पाए जाते थे . यही इनका परम्परागत पेशा था . विभिन्न प्रकार के कार्यों को इनके द्वारा किये जाने के कारण स्वाभाविक है कि अलग -अलग जातियां एवं उपजातियां भी अलग -अलग नामो से अस्तित्व में आ गई होंगी. आज हम इस तरह के कार्य करने वालो को अनेक नामों से जानते हैं .कहार जाति के लोगों को महरा ( जो संस्कृत शब्द महिला से लिया गया है ) के नाम से भी जाना गया है.घरेलु काम करने से महिलाओं के बीच रहने के कारण ही इन्हें ‘महरा’ कहा गया . चूँकि इन्हें अपने मालिक के घर में , जिनके यहाँ यह यह काम करते थे, मालकिन के शयनकक्ष और महिलाओं के बीच जाने की अनुमति होती थी. महिलाओं के बीच रहने के कारण इनका नाम महरा पड़ गया.

कहार को धीमर के नाम से भी जाना जाता है .जोकि संस्कृत के शब्द धीवर से लिया गया है . तात्पर्य यह है कि कहार और धीमर एक ही जाति है नहीं की अलग – अलग. बुंदेलखंड में पहले कहार को मछ्मारा के नाम से जाना जाता था. अर्थात जो मछली मारने या पकड़ने का रोजगार करता हो.कई अन्य छेत्रों में इन्हें सिंघरियां भी कहा गया है. यह नाम इनके द्वारा सिंघाड़े उत्पादन करने के कारण मिला

(द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ नार्थ वेस्टरर्न इंडिया )

कहार उपजाति का पूरे देश में जनसंख्या का घनत्व :

population density

धीमर, कहार जाति के लोगों ने कभी ब्राह्मण को गुरु नहीं माना

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एक प्राचीन किवदंती प्रचलित है कि कहार जाति के लोग ब्राह्मण को अपने अध्यात्मिक गुरु के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं. कहते हैं एक दिन नारद मुनि गुरु की खोज में रामचन्द्रजी के पास गए.रामचन्द्रजी ने कहा कि कल सुबह तुम्हारी गुरु से मुलाकात हो जाएगी. सुबह जिस व्यक्ति से तुम्हारी प्रथम मुलाकात होगी वही तुम्हारा गुरु होगा. अतः मुनि नारद ने रामचन्द्रजी के कथनानुसार जो व्यक्ति सुबह सबसे पहले मिला , झुककर उसे प्रणाम किया एवं गुरु कहकर उसे संबोधित किया. लेकिन शीघ्र ही नारद मुनि ने देखा कि जिस व्यक्ति को मैंने गुरु माना है वह व्यक्ति तो धीमर कहार जाति का मछुआरा है. उसके कंधे पर मछली मारने वाला जाल है. इससे प्रतीत हुआ कि वह मछली मारने का रोजगार करने वाला व्यक्ति है. नित्यप्रति की भांति वह मछली मारने जा रहा था. नारद मुनि ने विचार किया और सोचा कि इसको मै अपना गुरु कैसे मान सकता हूँ और कहा कि मै तुम्हे अपना गुरु नहीं मानता. नारद की इस बात पर कहार ने क्रोधित होकर शाप दे दिया कि तुम्हे स्वर्ग में जाने के लिए ८४लाख योनियों से गुजरना पड़ेगा. कहार के उस शाप से नारद मुनि काफी परेशान और चिंतित हो गए और रामचन्द्रजी से असंतोष प्रकट किया. मगर रामचंद्रजी ने उन पर धयान नहीं दिया. तब नारद मुनि ने जमीन पर ८४ लाख जीव -जंतुओं , कीड़े -मकोड़े के चित्र बनाकर उनका श्रदापूर्वक एक बार चक्कर लगाया. उसके बाद उस कहार से हाथ जोड़कर प्रार्थना और याचना की कि वे उन्हें माफ़ कर दे.मुझसे अनजाने में बहुत बड़ी भूल हो गई थी अब में आप को अपना गुरु स्वीकार करता हूँ एवं गुरु कहकर संबोधित किया.उसी समय से धीमर कहार जाति के लोग स्वयं को ब्राह्मणों का गुरु मानते हैं.ब्राह्मणों को अपना गुरु स्वीकार नहीं करते बल्कि जोगी को अपना गुरु मानते हैं.

लेखक  –    सुरेश कश्यप

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